हमारे देश में आज जब छोटे बच्चो की शिक्षा एक प्रकार का व्यवसाय बनता जा रहा है। भारतीय शिक्षा में बच्चे की स्वाभाविक जरूरतों की ओर ध्यान देने वाले स्कूल और अध्यापक विरले ही हैं। अक्सर शिक्षक का सारा ध्यान दी गयी विषयवस्तु को पढ़ा देने पर ही होता है। इस सीमित काम के लिए भी कक्षा में सामग्री की विविधता या ज्ञान की खोज और समझ की इच्छा को प्रोत्साहित करने वाला वातावरण बनाने तथा समय पर पैसा खर्च करना व्यर्थ माना जाता है। जिस प्रकार शिक्षक परंपरागत रूप से कक्षा कक्ष में शिक्षण कार्य करते हैं, ऐसे शिक्षकों को बिना सोचे समझे काम करने का इतिहास रहा है। उन्होंने अक्सर प्रमाणित सिद्धांतों को तथ्य के रूप में स्वीकार कर लिया है। मानव मस्तिष्क कैसे कार्य करता है इसके बारे में वे बहुत कम जानते हैं, अन्यथा शिक्षक अक्सर पिछले शोध एवं अनुसंधानकर्ताओं के निष्कर्षों का खंडन करते।